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वाल्मीकि रामायण 2.15

गत्वाश्रमपदं तत्र विचचार सुनिर्भया ।
न सापश्यत्स्थिता तत्र काञ्चिदभ्यागतां सखीम् ।। ७.२.१५ ॥

पूरा अध्याय