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वाल्मीकि रामायण 18.34

अथाब्रवीद्वैश्रवणः कृकलासं गिरौ स्थितम् ।
हैरण्यं सम्प्रयच्छामि वर्णं प्रीतस्तवाप्यहम् ।। ७.१८.३४ ॥

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