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वाल्मीकि रामायण 17.3

स दृष्ट्वा रूपसम्पन्नां कन्यां तां सुमहाव्रताम् ।
काममोहपरीतात्मा पप्रच्छ प्रहसन्निव ।। ७.१७.३ ॥

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