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वाल्मीकि रामायण 110.6

पुण्या वाता ववुश्चैव गन्धवन्तः सुखप्रदाः ।
पपात पुष्पवृष्टिश्च देवैर्मुक्ता महौघवत् ।। ७.११०.६ ॥

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