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वाल्मीकि रामायण 107.13

पौरेषु यदि ते प्रीतिर्यदि स्नेहो ह्यनुत्तमः ।
सपुत्रदाराः काकुत्स्थ समागच्छाम सत्पथम् ।। ७.१०७.१३ ॥

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