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वाल्मीकि रामायण 106.4

यदि प्रीतिर्महाराज यद्यनुग्राह्यता मयि ।
जहि मां निर्विशङ्कस्त्वं धर्मं वर्धय राघव ।। ७.१०६.४ ॥

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