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वाल्मीकि रामायण 106.17

अदृश्यं सर्वमनुजैः सशरीरं महाबलम् ।
प्रगृह्य लक्ष्मणं शक्रस्त्रिदिवं संविवेश ह ।। ७.१०६.१७ ॥

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