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वाल्मीकि रामायण 106.15

स गत्वा सरयूतीरमुपस्पृश्य कृताञ्जलिः ।
निगृह्य सर्वस्रोतांसि निःश्वासं न मुमोच ह ।। ७.१०६.१५ ॥

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