ग्रंथवाल्मीकि रामायणउत्तरकाण्डसर्ग 104104.17वाल्मीकि रामायण 104.17श्रुत्वा मे देवदेवस्य वाक्यं परममद्भुतम् । प्रीतिर्हि महती जाता तवागमनसम्भवा ।। ७.१०४.१७ ॥पिछलाअगलापूरा अध्याय