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वाल्मीकि रामायण 103.12

चोदितो राजसिंहेन मुनिर्वाक्यमभाषत ।
द्वन्द्वमेतत्प्रवक्तव्यं हितं वै यद्यपेक्षसे ।। ७.१०३.१२ ॥

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