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वाल्मीकि रामायण 102.12

अङ्गदं चापि सौमित्रिर्लक्ष्मणो ऽनुजगाम ह ।
चन्द्रकेतोस्तु भरतः पार्ष्णिग्राहो बभूव ह ।। ७.१०२.१२ ॥

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