ग्रंथवाल्मीकि रामायणउत्तरकाण्डसर्ग 1010.33वाल्मीकि रामायण 10.33एष मे परमोदार वरः परमको मतः । नहि धर्माभिरक्तानां लोके किञ्चन दुर्लभम् ।। ७.१०.३३ ॥पिछलाअगलापूरा अध्याय