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वाल्मीकि रामायण 98.22

स तमुद्यम्य चिक्षेप सो ऽप्यन्यां व्याक्षिपद्गदाम्।
भिन्नावन्योन्यमासाद्य पेततुर्धरणीतले ।। ६.९८.२५ ।।

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