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वाल्मीकि रामायण 96.11

खरस्य कुम्भकर्णस्य प्रहस्तेन्द्रजितोस्तथा।
करिष्यामि प्रतीकारमद्य शत्रुवधादहम् ।। ६.९६.११ ।।

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