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वाल्मीकि रामायण 95.15

हतो योजनबाहुश्च कबन्धो रुधिराशनः।
क्रोधान्नादं नदन् सो ऽथ पर्याप्तं तन्निदर्शनम् ।। ६.९५.१६ ।।

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