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वाल्मीकि रामायण 94.4

एकं रामं परिक्षिप्य समरे हन्तुमर्हथ।
वर्षन्तः शरवर्षेण प्रावृट्काल इवाम्बुदाः ।। ६.९४.४ ।।

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