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वाल्मीकि रामायण 91.34

तैः पृषत्कैर्ललाटस्थैः शुशुभे रघुनन्दनः।
रणाग्रे समरश्लाघी त्रिशृङ्ग इव पर्वतः ।। ६.९१.३४ ।।

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