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वाल्मीकि रामायण 91.18

सो ऽन्यत् कार्मुकमादय सज्यं चक्रे त्वरन्निव।
तदप्यस्य त्रिभिर्बाणैर्लक्ष्मणो निरकृन्तत ।। ६.९१.१८ ।।

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