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वाल्मीकि रामायण 90.47

निहतं सारथिं दृष्ट्वा समरे रावणात्मजः।
प्रजहौ समरोद्धर्षं विषण्णः स बभूव ह ।। ६.९०.४७ ।।

पूरा अध्याय