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वाल्मीकि रामायण 89.8

सो ऽभिचक्राम सौमित्रिं रोषात् संरक्तलोचनः।
अब्रवीच्चैनमासाद्य पुनः स परुषं वचः ।। ६.८९.८ ।।

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