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वाल्मीकि रामायण 89.14

ततः शरशतेनैव सुप्रयुक्तेन वीर्यवान्।
क्रोधाद्द्विगुणसंरब्धो निर्बिभेद विभीषणम् ।। ६.८९.१४ ।।

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