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वाल्मीकि रामायण 88.28

अकृत्वा कत्थसे कर्म किमर्थमिह राक्षस।
कुरु तत्कर्म येनाहं श्रद्दध्यां तव कत्थनम् ।। ६.८८.२८ ।।

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