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वाल्मीकि रामायण 88.21

इन्द्रजित्त्वात्मनः कर्म प्रसमीक्ष्याधिगम्य च।
विनद्य सुमहानादमिदं वचनमब्रवीत् ।। ६.८८.२१ ।।

पूरा अध्याय