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वाल्मीकि रामायण 87.12

न ज्ञातित्वं न सौहार्दं न जातिस्तव दुर्मते।
प्रमाणं न च सौदर्यं न धर्मो धर्मदूषण ।। ६.८७.१२ ।।

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