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वाल्मीकि रामायण 85.28

स एवमुक्त्वा द्युतिमान् वचनं भ्रातुरग्रतः।
स रावणिवधाकाङ्क्षी लक्ष्मणस्त्वरितो ययौ ।। ६.८५.२८ ।।

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