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वाल्मीकि रामायण 81.27

स तां बाणसहस्रेण विक्षोभ्य हरिवाहिनीम्।
हरिश्रेष्ठं हनूमन्तमिन्द्रजित् प्रत्युवाच ह ।। ६.८१.२७ ।।

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