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वाल्मीकि रामायण 79.27

राममुक्तांस्तु बाणौघान् राक्षसस्त्वच्छिनद्रणे।
रक्षोमुक्तांस्तु रामो वै नैकधा प्राच्छिनच्छरैः ।। ६.७९.२७ ।।

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