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वाल्मीकि रामायण 79.24

जीमूतयोरिवाकाशे शब्दो ज्यातलयोस्तदा।
धनुर्मुक्तः स्वनोत्कृष्टः श्रूयते च रणाजिरे ।। ६.७९.२४ ।।

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