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वाल्मीकि रामायण 76.35

हतप्रवीरा व्यथिता राक्षसेन्द्रचमूस्तदा।
जगामाभिमुखी सा तु कुम्भकर्णसुतो यतः ।। ६.७६.३५ ।।

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