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वाल्मीकि रामायण 75.5

उल्काहस्तैर्हरिगणैः सर्वतः समभिद्रुताः।
आरक्षस्था विरूपाक्षाः सहसा विप्रदुद्रुवुः ।। ६.७५.५ ।।

पूरा अध्याय