Utshovऐप डाउनलोड करें

वाल्मीकि रामायण 74.37

हरिपादविनिर्भग्नो निषसाद स पर्वतः।
न शशाक तदा ऽ ऽत्मानं सोढुं भृशनिपीडितः ।। ६.७४.३७ ।।

पूरा अध्याय