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वाल्मीकि रामायण 74.34

ताः सर्वा हनुमन् गृह्य क्षिप्रमागन्तुमर्हसि।
आश्वासय हरीन् प्राणैर्योज्य गन्धवहात्मज ।। ६.७४.३४ ।।

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