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वाल्मीकि रामायण 73.55

ते ऽन्योन्यमभिसर्पन्तो निनदन्तश्च विस्वरम्।
राक्षसेन्द्रास्त्रनिर्भिन्ना निपेतुर्वानरर्षभाः ।। ६.७३.५५ ।।

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