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वाल्मीकि रामायण 70.37

ततो हनूमानुत्प्लुत्य हयांत्रिशिरसस्तदा।
विददार नखैः क्रुद्धो गजेन्द्रं मृगराडिव ।। ६.७०.३७ ।।

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