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वाल्मीकि रामायण 70.22

तद्बाणशतनिर्भिन्नं विदारितशिलातलम्।
सविस्फुलिङ्गं सज्वालं निपपात गिरः शिरः ।। ६.७०.२२ ।।

पूरा अध्याय