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वाल्मीकि रामायण 69.98

स मुष्टिनिष्पष्टविभिन्नवक्षा ज्वालावमच्छोणितदिग्धगात्रः।
नरान्तको भूमितले पपात यथा ऽचलो वज्रनिपातभग्नः ।। ६.६९.९८ ।।

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