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वाल्मीकि रामायण 68.5

कुम्भकर्णस्तव भ्राता काकुत्स्थशरपीडितः।
लगण्डभूतो विकृतो दावदग्ध इव द्रुमः ।। ६.६८.५ ।।

पूरा अध्याय