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वाल्मीकि रामायण 66.10

प्रांशुभिर्गिरिशृङ्गैश्च शिलाभिश्च महाबलः।
पादपैः पुष्पिताग्रैश्च हन्यमानो न कम्पते ।। ६.६६.१० ।।

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