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वाल्मीकि रामायण 64.34

सा पुरा सुखसंवृद्धा सुखार्हा दुःखकर्शिता।
त्वय्यधीनं सुखं ज्ञात्वा सर्वथोपगमिष्यति ।। ६.६४.३४ ।।

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