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वाल्मीकि रामायण 64.17

हीनार्थः सुसमृद्धार्थं को रिपुं प्राकृतं यथा।
निश्चित्य जीवितत्यागे वशमानेतुमिच्छति ।। ६.६४.१७ ।।

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