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वाल्मीकि रामायण 58.52

तमुग्रवेगं संरब्धमापतन्तं महाकपिः ।
ततः सम्प्रेक्ष्य जग्राह महावेगो महाशिलाम् ।। ६.५८.५२ ।।।।

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