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वाल्मीकि रामायण 57.14

प्रदानेन तु सीतायाः श्रेयो व्यवसितं मया ।
अप्रदाने पुनर्युद्धं दृष्टमेतत्तथैव नः ।। ६.५७.१४ ।।।।

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