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वाल्मीकि रामायण 55.18

रजश्चारुणवर्णाभं सुभीममभवद्भृशम् ।
उद्भूतं हरिरक्षोभिः संरुरोध दिशो दश ।। ६.५५.१८ ।।।।

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