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वाल्मीकि रामायण 51.19

एवमुक्तस्तु धूम्राक्षो राक्षसेन्द्रेण धीमता ।
कृत्वा प्रणामं संहृष्टो निर्जगाम नृपालयात् ।। ६.५१.२० ।।।।

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