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वाल्मीकि रामायण 51.12

विमुक्तौ शरबन्धेन तौ दृश्येते रणाजिरे ।
पाशानिव गजौ छित्त्वा गजेन्द्रसमविक्रमौ ।। ६.५१.१३ ।।।।

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