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वाल्मीकि रामायण 50.44

को भवान् रूपसम्पन्नो दिव्यस्रगनुलेपनः ।
वसानो विरजे वस्त्रे दिव्याभरणभूषितः ।। ६.५०.४४ ।।।।

पूरा अध्याय