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वाल्मीकि रामायण 47.4

रावणश्चापि संहृष्टो विसृज्येन्द्रजितं सुतम् ।
आजुहाव ततः सीतारक्षिणी राक्षसीस्तदा ।। ६.४७.४ ।।।।

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