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वाल्मीकि रामायण 45.14

भिन्नाञ्जनचयश्यामो विस्फार्य विपुलं धनुः ।
भूयो भूयः शरान् घोरान् विससर्ज महामृधे ।। ६.४५.१४ ।।।।

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