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वाल्मीकि रामायण 43.32

वज्राशनिसमस्पर्शो द्विविदो ऽप्यशनिप्रभम् ।
जघान गिरिशृङ्गेण मिषतां सर्वरक्षसाम् ।। ६.४३.३२ ।।।।

पूरा अध्याय