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वाल्मीकि रामायण 43.24

नलः प्रतपनस्याशु पातयामास चक्षुषी ।
भिन्नगात्रः शरैस्तीक्ष्णैः क्षिप्रहस्तेन रक्षसा ।। ६.४३.२४ ।।।।

पूरा अध्याय